जल संसाधन [Water Resources UPSC NCERT Notes]


जल संसाधन [Water Resources UPSC NCERT Notes]
जल संसाधन (Image by wirestock on Freepik)

जल संसाधन –

भूमि के बाद दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन जल है। पृथ्वी पर पाये जानेवाले सभी प्रकार के जल को जल संसाधन के अन्दर रखते हैं। पर्वतों पर जल हिमानी के ठोस रूप में रहता है, वायुमण्डल में जल वाष्प के रूप में रहता है व पृथ्वी पर जल तरल रूप में पाया जाता है।

जल की आवश्यकता (Need of Water) –

जितने भी जीवधारी (प्राणी व पौधे) हैं उनकी संरचना में पानी का एक बड़ा भाग है। मनुष्य के स्वयं की बनावट में 65 प्रतिशत पानी है। यही नहीं बल्कि उसकी सम्पूर्ण क्रियाओं में और उसके स्वयं के रख-रखाव में भी पानी का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। यह हड्डियों के बीच के जोड़ों को चिकना बनाये रखता है, ताकि वे आपस में रगड़कर एक-दूसरे को हानि न पहुँचावें। ऊतकों (tissues) और माँसपेशियों (muscles) को घेर कर उन्हें आपस में चिपकने से रोकता है। शरीर के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अवयव, जैसे हृदय, मस्तिष्क आदि को पानी से बने द्रव का एक कवचल संरक्षण प्रदान करता है। यही नहीं बल्कि शरीर के अन्दर यह महत्त्वपूर्ण संचार माध्यम भी है तथा शरीर के विभिन्न हिस्सों के बीच सम्पर्क बनाये रखता है। यही पोषक तत्त्व, ऑक्सीजन, कार्बन-डाईऑक्साइड का वाहक है और शरीर के मलिन पदार्थों को पसीना, मल और मूत्र के जरिये शरीर से बाहर ले जाता है। इसी कारण पानी की कमी मनुष्य को सहन नहीं हो पाती है और जल की कमी से उसकी मृत्यु तक हो जाती है। पेड़ों और वनस्पति में हरियाली इसी जल के कारण है। फल-फूल, सब्जी और कोई भी प्रकृति में उत्पन्न होने वाली वस्तु जल के बिना हो सके यह सम्भव नहीं, इसके बाद उसकी वृद्धि और उपयोगिता भी केवल जल के कारण है। मनुष्य को पानी की नितान्त आवश्यकता है। वृक्ष में 40 प्रतिशत तक पानी होता है। कुछ जलीय पौधों में तो जल की मात्रा 90 प्रतिशत तक होती है— जेलफिस समुद्री जीव में 95 प्रतिशत, अण्डे में 75 प्रतिशत और ककड़ी तथा खीरा में 95 प्रतिशत जल की मात्रा होती है। स्वस्थ रहने के लिए सभी यही सुझाव देते हैं कि पानी अधिक पीना चाहिए। जल तीनों अवस्थाओं में, ठोस बर्फ के रूप में, द्रव-जल के रूप में तथा गैस- वाष्प के रूप में रहता है।

जल के स्त्रोत (Sources of Water ) –

प्राकृतिक स्रोतों में जल का सबसे अधिक महत्त्व है तथा पृथ्वी पर जल 75 प्रतिशत क्षेत्र को घेरे हुए है। जल के प्रमुख स्रोत निम्नप्रकार प्रकार हैं-

  1. महासागर तथा समुद्री जल (Ocean and Sea’s Water) – यह पानी खारा होता है इसलिए उपयोगी कम है, कुल पृथ्वी के जल का 93 प्रतिशत समुद्रों का है।
  2. नदियों का जल – अपेक्षाकृत यह उपयोगी होता है।
  3. वर्षा का जल
  4. झीलों और तालाबों का जल
  5. कुओं, नलों तथा नलकूपों का जल

आज नदियों, कुओं, नलों तथा नलकूपों के जल का उपयोग पौधों की सिंचाई तथा घरेलू आवश्यकता के लिए उपयोग किया जाता है।

जल के प्रकार (Types of Water) –

जल के निम्न प्रकार पाये जाते हैं-

  1. अधोभौमिक जल – जल का कुछ भाग भूमि के द्वारा सोख लिया जाता है। पृथ्वी के जिन भागों में दरारें होती हैं वहाँ से रिस-रिसकर जल पृथ्वी के नीचे चला जाता है जिसे अधोभौमिक जल कहते हैं। यह अवशोषित जल पृथ्वी के नीचे अधोभौमिक जल के रूप में पाया जाता है जिसे भूमि जल भी कहते हैं। हैण्डपाइपों, नलकूपों और कुओं द्वारा अधोभौमिक जल को पृथ्वी पर निकाला जाता है।
  2. वर्षा का जल – वर्षा के द्वारा प्राप्त जल को वर्षा का जल कहते हैं। अधिक तापमान के कारण समुद्रों का जल भाप बनकर वायुमण्डल में चला जाता है जहाँ वह मेघ के रूप में रहता है। जब इन मेघों का भार वायु सहने में असमर्थ हो जाती है तो जल वर्षा के रूप में पृथ्वी पर आ जाता है। यह जल का सबसे शुद्ध रूप होता है।
  3. नदी का जल – नदी, समुद्र और तालाबों में वर्षा का जल ही पाया जाता है। पृथ्वी पर बहनेवाली जल की धारा को नदी या सरिता कहते हैं। उत्तर भारत में बहनेवाली सभी प्रमुख नदियाँ जैसे-गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, घाघरा, गंडक, कोसी, चम्बल, सतलज, व्यास और गोमती नदियाँ पर्वतों की हिम से ढकी चोटी से निकलने के कारण वर्ष भर जल से भरी रहती हैं। दक्षिण भारत की नदियाँ – नर्मदा, ताप्ती, महानदी, गोदावरी एवं कृष्णा मुख्य हैं। नर्मदा और ताप्ती नदी पश्चिम की ओर अरब सागर में गिरती हैं और अन्य नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। कुछ नदियाँ झीलों, झरनों व दलदली क्षेत्रों से ही निकलती हैं।

उत्तरी व दक्षिणी भारत की नदियों की तुलना –

क्र.सं.उत्तर भारत की नदियाँक्र.सं.दक्षिण भारत की नदियाँ
1.उत्तर भारत की नदियाँ हिमालय के बर्फ से ढकी चोटियों से निकलती हैं | इसलिए इनमें वर्षभर जल रहता है |1.दक्षिण भारत की नदियाँ छोटे एवं कम ऊँचे पठारों से निकलती हैं | इसलिए गर्मी में ये सूख जाती हैं |
2.उत्तर भारत की नदियाँ लम्बी होती हैं और इनका प्रवाह-क्षेत्र भी लम्बा होता है |2.दक्षिण भारत की नदियाँ छोटी होती हैं और इनका प्रवाह-क्षेत्र भी छोटा होता है |
3.ये नदियाँ जल प्रपात नहीं बनातीं |3.ये नदियाँ जल प्रपात बनाती हैं |
4.उत्तर भारत की नदियों से विद्युत् उत्पादन नहीं हो सकता |4.दक्षिण भारत की नदियाँ जल विद्युत् उत्पादन के लिए अनुकूल होती हैं |
5.ये नदियाँ समतल एवं उर्वर भागों से बहती हैं | इनसे सिचाई हो सकती है |5.ये नदियाँ उबड़-खाबड़ रास्तों से बहती हैं और गहरी घाटियाँ बनाती हैं |
6.उत्तरी भारत की नदियाँ उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी के मैदान बनाती हैं |6.दक्षिण भारत की नदियाँ छोटे और उर्वर डेल्टा बनाती हैं |
7.उत्तरी भारत की नदियों में परिवाहन होता है क्योंकि इनकी गति धीमी होती है |7.दक्षिण भारत की नदियाँ ऊँची-नीची भूमि से निकलती हैं इसलिए उनमें परिवहन सम्भव नहीं है |

पृथ्वी पर जल का रूप –

पृथ्वी पर जल हमें निम्न रूपों में मिलता है-

1. समुद्री जल –

समुद्री जल खारा होता है। यह जल किसी भी कार्य के लिए उपयुक्त नहीं है। इस जल में परिवहन कार्य, मत्स्य पालन का कार्य और नमक बनाने का काम होता है। नदियाँ अपने साथ जो लवण बहाकर लाती हैं उसे समुद्रों में गिरा देती हैं। जिससे समुद्री जल खारा हो जाता है। सागरों से जल का वाष्पीकरण होता है जिससे जल की काफी मात्रा वाष्प बनकर उड़ जाती है। और लवण नीचे रह जाता है जिससे समुद्रों का जल और खारा हो जाता है। भारत के प्रायद्वीपीय भाग के दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में समुद्र पाया जाता है जिससे भारत में विदेशी व्यापार, मत्स्य पालन और अन्य समुद्री संसाधन में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। मुम्बई, कोचीन, कान्धला, कोलकाता, विशाखापट्टनम भारत के मुख्य बन्दरगाह हैं जिनसे विदेशी व्यापार भी होता है।

2. तालाब का जल –

भूमि के निचले भागों में वर्षा का जल एकत्र होकर तालाब का रूप धारण कर लेता है। तालाब के विस्तृत रूप को झील कहते हैं। कुछ तालाब प्राकृतिक होते हैं तो कुछ का निर्माण कृत्रिम रूप से भी किया जाता है। नदी के ऊपर बाँध के बनने से कृत्रिम जलाशयों का निर्माण होता है। नदी में धारा का प्रवाह निरंतर होता है, जबकि जलाशयों का जल स्थिर रहता है | भारत में 2 लाख जलाशय पाये जाते हैं जिनसे सिंचाई व मत्स्य पालन किया जाता है | इनसे देश के 6.1% भागों पर सिंचाई होती है। भारत के तमिलनाडु राज्य में सबसे ज्यादा सिचाई तालाबों से होती है। भारत के मध्य प्रदेश, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और पश्चिमी बंगाल में तालाबों द्वारा जल की आवश्यकता की पूर्ति की जाती हैं।

3. बाढ़ –

भारत में मानसूनी हवाओं से लगातार वर्षा होने से नदियों में बाढ़ (Flood) की स्थिति आ जाती है। बाढ़ से खड़ी फसलों और अपार धन-जन की हानि होती है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल और असम राज्यों में प्रति वर्ष बाढ़ से काफी नुकसान होता है। जिन नदियों का क्षेत्र भूकम्प और भूस्खलन से प्रभावित होता है वहाँ अधिक बाढ़ आती है। भारत में प्रतिवर्ष बाढ़ की वृद्धि का मुख्य कारण वनों की कटाई हैं।

बाढ़ नियन्त्रण (Flood Control) –

व्यक्तिगत व सरकारी स्तर पर बाढ़ रोकने (Flood control) के लिए निम्न उपाय किये गये हैं-

  1. भूमि पर अधिक-से-अधिक वन लगाना, जिससे भूमि का कटाव रोका जा सके।
  2. समय – समय पर नदियों को अधिक गहरा करना जिससे उनमें जल धारण करने की क्षमता अधिक हो |
  3. बाढ़ग्रस्त नदियों के ऊपर तट बाँध बनाये गये हैं जिससे भविष्य में बाढ़ न आये।
  4. सरकार ने 1954 में बाढ़ नियन्त्रण कार्यक्रम बनाये और 1976 में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की स्थापना की।
  5. 1991 में 15467 किमी लम्बे तट बाँध बनाये गये, 857 नगर बाढ़ बचाओ योजनाएँ शुरू की गयीं, 5 हजार गाँवों के तल को ऊँचा करने पर काम किया गया।
  6. बाढ़ की पूर्व चेतावनी के लिए 151 ‘बाढ़ पूर्व सूचना संगठन’ को स्थापना की गयी।

जल का बजट और उपयोग (Water Budget and Uses) –

भारत के कुल क्षेत्रफल और वार्षिक वर्षा के औसत के अनुसार कुल जल संसाधन 16.7 करोड़ हेक्टेयर है। यहाँ प्रति व्यक्ति जल उपभोग की मात्रा 610 घन मीटर है। भारत में सिंचाई के लिए केवल 6.6 करोड़ हेक्टेयर मीटर जल का ही उपयोग होता है। भारत ने आर्थिक तथा प्राविधिक संसाधनों की सीमाओं को ध्यान में रखकर सन् 2010 तक जल संसाधनों के क्रमबद्ध उपयोग की सीमा निर्धारित की है। स्वतन्त्रता के समय केवल 2.26 हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई होती थी जिसे बढ़ाकर 4.2 करोड़ हेक्टेयर कर दिया गया। जल संसाधन की अनुभागिता क्षमता में भूमिगत जल को भी सम्मिलित किया गया है। भूमिगत जल के सम्भावित उपयोग की अनुमानित मात्रा 4 करोड़ हेक्टेयर है जिसमें केवल 1 करोड़ हेक्टेयर मीटर जल का ही उपयोग हो रहा है। देश में 3 करोड़ हेक्टेयर मीटर जल का उपयोग करना बाकी है। भारत में जल का सम्भावित बजट उपलब्ध हैं परन्तु फिर भी राष्ट्रीय जल का बजट सन्तुलित अवस्था में नहीं है।

भारत में सिंचाई के कई प्रकार के साधन उपलब्ध हैं-

  • नहरों द्वारा सिंचाई,
  • कुओं तथा नलकूपों द्वारा सिंचाई,
  • तालाब द्वारा सिचाई।

जल-बजट और खाद्यान्न बजट का महत्त्व –

भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार यहाँ की कृषि है इसलिए कृषि के महत्त्व को बढ़ाना चाहिए। भारत में वर्षभर फसलें उत्पन्न की जाती हैं परन्तु भारतीय कृषि को ‘मानसून का जुआ’ कहते हैं क्योंकि मानसूनी वर्षा पर ही यहाँ की कृषि आधारित है। सिंचाई के द्वारा भी खेतों को हरा-भरा किया जाता है। घरेलू कार्यों में भी जल की आवश्यकता होती है। यदि हमें खाद्यान्नों में वृद्धि करनी हैं तो जल संसाधन में भी वृद्धि करनी होगी जिससे खाद्यान्न के उत्पादन में उचित सफलता मिल सके। यदि ऐसा नहीं होता है तो खाद्यान्न बजट भी प्रभावित होगा और जल संसाधन भी प्रभावित होगा, जिससे जल विद्युत् शक्ति का उत्पादन भी नहीं हो पायेगा। इसलिए जल बजट और खाद्यान्न बजट में समानता रखना बहुत जरूरी है।