लीग ऑफ नेशन्स क्या है ? उद्देश्य, कार्य एवं विफलताएँ


लीग ऑफ नेशन्स (League of Nations) –

पेरिस के शान्ति सम्मेलन में अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति की स्थापना के लिए 14 सूत्रीय सिद्धान्त प्रस्तुत किये। इसमें उन्होंने विश्व में स्थायी शान्ति के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था लीग ऑफ नेशन्स (League of Nations) की स्थापना का विचार रखा। पेरिस शान्ति सम्मेलन के अधिकांश सदस्यों ने इस विचार पर अपनी सहमति व्यक्त की ।

लीग ऑफ नेशन्स’ की स्थापना –

पेरिस शान्ति सम्मेलन की सहमति के आधार पर 10 जनवरी, 1920 ई० को जेनेवा (स्विट्जरलैण्ड) में लीग ऑफ नेशन्स की स्थापना की गयी। आरम्भ में इसमें 42 राष्ट्र थे किन्तु धीरे-धीरे यह संख्या बढ़कर 60 हो गयी।

‘लीग ऑफ नेशन्स’ के उद्देश्य –

‘लीग ऑफ नेशन्स’ के निम्न प्रमुख उद्देश्य थे :

  1. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति, सुरक्षा व सद्भावना के लिए सकारात्मक प्रयास करना ।
  2. भावी युद्धों को रोकने के लिए विश्व स्तर पर सैनिक कार्रवाई का मुखर विरोध करना।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहन देना।
  4. विभिन्न राष्ट्रों के परस्पर विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाना ।
  5. संसार में नि:शस्त्रीकरण के लिए प्रयास करना ।
  6. संसार में मजदूरों की दशा सुधारने का सकारात्मक प्रयास करना ।
  7. दास-व्यापार को समूल समाप्त करना।
  8. जनकल्याणकारी कार्यों को करना, स्त्रियों एवं बच्चों के क्रय-विक्रय पर रोक तथा जनसामान्य की दशा में सुधार करने का प्रयास करना । आरम्भ में वुडरो विल्सन के प्रस्ताव के आधार पर सहमत होते हुए 42 राष्ट्रों ने इसकी सदस्यता ग्रहण की थी किन्तु धीरे-धीरे कतिपय अन्य देश भी इसमें शामिल होते गये और यह संख्या 60 तक पहुँच गयी। 1926 ई० में जर्मनी और 1934 ई0 में रूस को इसकी सदस्यता प्रदान की गयी।

‘लीग ऑफ नेशन्स’ की सदस्यता –

‘लीग ऑफ नेशन्स’ एक अन्तर्राष्ट्रीय संघ था। कोई भी राष्ट्र तभी इसका सदस्य बन सकता था, जबकि उस देश की कम-से- कम एक-तिहाई जनसंख्या सदस्यता प्राप्त करने के पक्ष में अपना मत प्रस्तुत करे।

किसी भी सदस्य राष्ट्र को इस संघ से अलग होने के लिए पूर्व सूचना देना आवश्यक था। इस संघ की स्थापना अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के सद्प्रयासों का परिणाम थी किन्तु इसका जन्मदाता अमेरिका अमेरिकी सीनेट के विरोध के कारण संघ का सदस्य नहीं बन सका। अमेरिका का सदस्य न बनना ही कालान्तर में इसकी असफलता का कारण बना।

‘लीग ऑफ नेशन्स’ के प्रमुख अंग –

‘लीग ऑफ नेशन्स’ के प्रमुख अंग इस प्रकार थे –

  1. साधारण सभा – साधारण सभा में ‘लीग ऑफ नेशन्स’ के सभी सदस्य सम्मिलित होते थे। इस सभा का अधिवेशन प्रत्येक वर्ष सितम्बर में जेनेवा में होता था। प्रत्येक सदस्य राष्ट्र इसमें अपने तीन प्रतिनिधि प्रतिभाग करने के लिए भेज सकता था किन्तु मत देने का अधिकार प्रत्येक सदस्य राष्ट्र के एक ही प्रतिनिधि को होता था ।
  2. परिषद् – ‘लीग ऑफ नेशन्स’ की कार्यकारिणी को परिषद् कहा जाता था। परिषद् में स्थायी तथा अस्थायी दो प्रकार के सदस्य होते थे। इसके वर्ष में कम-से-कम तीन अधिवेशन होने अनिवार्य थे।
  3. सचिवालय – ‘लीग ऑफ नेशन्स’ का महत्त्वपूर्ण अंग सचिवालय था। इसका मुख्यालय जिनेवा में था। इसके प्रमुख महासचिव कहा जाता था। को
  4. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय- ‘लीग ऑफ नेशन्स’ की स्थापना के लगभग 1 वर्ष बाद 1921 ई० में इसकी स्थापना की गयी। इसका मुख्यालय हेग (हालैण्ड) में स्थापित किया गया। इसमें न्यायाधीशों की संख्या 15 निश्चित की गयी तथा इनका कार्यकाल 7 वर्ष रखा गया।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संघ – इसकी स्थापना राष्ट्रसंघ के साथ-साथ हुई। ‘लीग ऑफ नेशन्स’ का प्रत्येक सदस्य राष्ट्र इसका

‘लीग ऑफ नेशन्स’ के कार्य

‘लीग ऑफ नेशन्स’ ने निम्न कार्य किये-

  1. विभिन्न विवादों का हल लीग ऑफ नेशन्स’ ने अल्वानिया और हालैण्ड के विवाद, फ्रांस और ब्रिटेन का विवाद, मेमल समस्या, पौलेण्ड तथा चेकोस्लोवाकिया के विवादों को हल करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।
  2. ‘ लीग ऑफ नेशन्स’ ने विभिन्न देशों को आर्थिक सहायता भी दी। आस्ट्रिया, यूनान और बल्गारिया आर्थिक सहायता प्राप्त करने वाले देशों में शामिल थे।
  3. सामाजिक कार्यों के अन्दर राष्ट्रसंघ ने हैजा, चेचक, मलेरिया आदि रोगों की रोक-थाम का प्रयत्न किया। इसके अतिरिक्त अन्य सामाजिक समस्याओं के निदान के लिए भी कार्य किये।
  4. स्मारकों, कलाकृतियों की सुरक्षा, प्रौढ़ एवं श्रमिकों की शिक्षा जैसे बौद्धिक कार्य भी राष्ट्रसंघ द्वारा सम्पन्न किये गये।

‘लीग ऑफ नेशन्स’ की विफलताएँ –

‘लीग ऑफ नेशन्स’ लगभग दो दशक तक अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति में सकारात्मक सहयोगी रहा किन्तु संसार के शक्तिशाली राष्ट्रों की स्वार्थप्रियता व अनुचित हस्तक्षेप के कारण 1931 ई० में जापान को मंचूरिया पर 1936 ई० में इटली को एबीसिनिया पर 1938-39 ई० में जर्मनी (हिटलर) को आस्ट्रिया, चेकोस्लोवाकिया तथा मेमल पर अधिकार कर लेने से रोक न सका और अन्त में 1 सितम्बर, 1939 ई० को हिटलर द्वारा पोलैण्ड पर आक्रमण कर देने के परिणामस्वरूप ‘लीग ऑफ नेशन्स’ का सिद्धान्ततः अन्त हो गया।

‘लीग ऑफ नेशन्स’ की असफलता के कारण –

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के लिए जिस संगठन की कल्पना की गयी वह वास्तव में ‘लीग ऑफ नेशन्स’ के रूप मैं अपने उद्देश्यों को पूरा करने में असफल रहा। इसकी असफलता के निम्न कारण थे :

  1. संगठनात्मक दोष – इसका संगठनात्मक ढाँचा दोषपूर्ण था। आरम्भ में जर्मनी और रूस जैसे महत्त्वपूर्ण राष्ट्रों को इसकी सदस्यता से दूर रखा गया। इंग्लैण्ड और फ्रांस इसके शक्तिशाली सदस्य थे और ये दोनों हमेशा अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति में लगे रहते थे।
  2. दण्डात्मक शक्ति का अभाव – इस संगठन के पास कोई प्रभावी निषेधात्मक शक्ति नहीं थी और न ही कोई अपनी सेना; | फलतः यह अपने उद्देश्यों को पूरा करने में असफल रहा।
  3. अमेरिका का असहयोग- विश्व का प्रभावशाली राष्ट्र एवं इस संगठन का जन्मदाता अमेरिका इसका सदस्य न बन सका । वास्तव में यह संगठन अपने आदर्श स्वरूप में केवल दस्तावेजों तक ही सीमित रह गया।
  4. ‘लीग ऑफ नेशन्स’ के सदस्य देशों ने इसके उद्देश्यों के आधार पर कार्य न करके अपने स्वार्थों को ही ध्यान में रखा।
  5. ‘लीग ऑफ नेशन्स’ के पास सैनिक संगठन का अभाव था। सैनिक शक्ति के अभाव में यह संस्था सफल न हो सकी।

‘लीग ऑफ नेशन्स’ का महत्त्व –

‘लीग ऑफ नेशन्स’ की स्थापना अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक रचनात्मक एवं महत्त्वपूर्ण प्रयास अवश्य था क्योंकि इस संस्था ने संसार को पहली बार संकुचित दृष्टिकोण के स्थान पर व्यापक हितों के संरक्षण को प्रोत्साहित किया तथा अल्पसंख्यकों के हितों को संरक्षण प्रदान किया। कालान्तर में इसी नींव पर संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी महत्त्वपूर्ण संस्था की आधारशिला रखी जा सकी।