ऊर्जा संसाधन [Energy Resources UPSC NCERT Notes]


ऊर्जा संसाधन का अर्थ –

किसी भी देश के औद्योगिकीकरण में कारखानों को चलाने के लिए किसी-न-किसी चालक या शक्ति के साधन की आवश्यकता पड़ती है। वे पदार्थ जिनसे मशीनों को चलाने के लिए शक्ति प्राप्त होती है, शक्ति या ऊर्जा के साधन कहलाते हैं। प्राचीन काल से ही मानव ने शक्ति के साधनों को खोजने का कार्य जारी रखा है। सर्वप्रथम वे छोटे-मोटे कार्यों के लिए लकड़ी के कोयले का प्रयोग करते थे, बाद में उसने पत्थर के कोयले, खनिज तेल, वायुजल तथा जल-विद्युत् द्वारा उद्योगों का संचालन करना सीख लिया।

भारत के शक्ति-स्रोतों का अभी पूर्णरूप से विकास नहीं हुआ है। भारत अपनी आवश्यकता के अनुसार खनिज तेल एवं जल- विद्युत् शक्ति के उत्पादन की मात्रा बढ़ा रहा है, किन्तु विश्व के उन्नतिशील देशों की तुलना में भारत में शक्ति का उत्पादन अभी कम है। वे संसाधन जो पृथ्वी के अन्दर से प्राप्त होते हैं उनकी मात्रा सीमित होती है इसलिए उनका उपयोग मितव्ययिता से करना चाहिए। कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैसों की उत्पत्ति जैविक पदार्थों से हुई है इसलिए इन्हें जीवाश्म ईंधन कहते हैं। इन पदार्थों को पृथ्वी से निकालने के बाद साफ करके उपयोग किया जाता है। इन पदार्थों के दो अवगुण होते हैं-

  1. एक बार उपयोग के बाद ये पदार्थ खत्म हो जाते हैं। इनका दुबारा नवीनीकरण नहीं किया जा सकता है।
  2. इन संसाधनों के प्रयोग से धुआँ, राख, गन्दगी आदि होती है जिनसे समस्त वातावरण दूषित हो जाता है।

कोयला (Coal) :-

कोयला शक्ति का सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन है। किसी भी देश में इसकी उपस्थिति उस देश की प्रगति की सूचक है। इसका उपयोग शक्ति के साधन के रूप में और उद्योगों में कच्चे माल के रूप में किया जाता है। इसकी इतनी उपयोगिता है कि लोग इसे ‘काला सोना’ या ‘काला हीरा’ (Black Diamond) कहते हैं।

भारत कोयला उत्पादन में विश्व में छठवें स्थान पर है। यह विश्व का सबसे महत्त्वपूर्ण कोयला उत्पादक देश है। चीन और अमेरिका के बाद भारत सबसे अधिक कोयला उत्पन्न करता है। भारतीय भूगर्भीय सर्वेक्षण के अनुसार 1 अप्रैल, 2010 को देश में 1200 मीटर की गहराई तक सुरक्षित कोयले का भंडार 285.87 बिलियन टन था। यहाँ कुल संचित कोयला भण्डार का 20% झारखण्ड, 20% ओडिशा, 11.3% पश्चिमी बंगाल, 21% छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश 14.0 % तथा शेष 11.1% अन्य राज्यों में पाया जाता है।

भारत में तीन प्रकार का कोयला पाया जाता है-

  1. एन्थ्रेसाइट
  2. बिटुमिनस
  3. लिग्नाइट।

भारत के कोयला क्षेत्र को दो भागों में बाँटा गया है- –

  1. गोण्डवाना कोयला क्षेत्र :- भारत का 98% कोयला गोण्डवाना कोयला क्षेत्र में पाया जाता है। इसका विस्तार मध्य प्रदेश, दामोदर घाटी, आन्ध्र प्रदेश और ओडिशा की खानों में है। गोण्डवाना कोयला क्षेत्र प्रायद्वीपीय भारत की नदी घाटियों में फैला है।
  1. टरशियरी कोयला क्षेत्र :- टरशियरी कोयला क्षेत्र राजस्थान, कश्मीर और असोम की खदानों से मिलता है। 2% कोयला टरशियरी खानों से प्राप्त किया जाता है।

भारत में कोयले का वितरण :-

भारत में राज्य के अनुसार कोयले का वितरण निम्न प्रकार है-

  1. झारखण्ड – झारखण्ड राज्य कोयला उत्पादन तथा संचित भण्डार दोनों ही क्षेत्र में भारत में प्रथम स्थान पर है। यहाँ से भारत का 20% कोयला निकाला जाता है। दामोदर घाटी में झरिया, बोकारो, गिरिडीह, डाल्टनगंज, कर्णपुरा और रामगढ़ मुख्य कोयला उत्पादक क्षेत्र हैं। यहाँ पर झरिया में सबसे बड़ी कोयला खान हैं जिसका विस्तार 436 वर्ग किमी क्षेत्र में है। इस स्थान से बिटुमिनस कोयला मिलता है।
  2. ओडिशा – कोयला उत्पादन में इस राज्य का स्थान दूसरा है। ओडिशा राज्य के मुख्य कोयला उत्पादक क्षेत्र सुन्दरगढ़, धेनकनाल और सम्बलपुर हैं।
  3. पश्चिमी बंगाल – कोयला उत्पादन में इस राज्य का स्थान तीसरा है। यहाँ से 21% कोयला प्राप्त होता है। यहाँ पर रानीगंज मुख्य कोयला उत्पादक क्षेत्र है जहाँ से कोकिंग और गैर-कोकिंग किस्म का कोयला निकाला जाता है।
  4. आन्ध्र प्रदेश – कोयला उत्पादन में यह राज्य भारत में चौथे स्थान पर है। यहाँ से देश का 10% कोयला उत्पन्न किया जाता है। यहाँ पर गोदावरी नदी की घाटी से कोयला निकाला जाता है। इस घाटी में सिंगरेनी, तन्दूर और सस्ती प्रमुख कोयला क्षेत्र हैं।
  5. मध्य प्रदेश – कोयला उत्पादन में इस राज्य का स्थान उल्लेखनीय हैं। सिंगरौली, उमरिया, कोटार, सोहागपुर, शाहपुर- तवा, कान्हन घाटी यहाँ के मुख्य कोयला उत्पादक क्षेत्र हैं। यहाँ से भारत का 14% कोयला निकाला जाता है।
  6. छत्तीसगढ़ – छत्तीसगढ़ राज्य में कोरबा, रायगढ़, मांडघाटी डामनारा, छालमोड़, धारामा, विश्रामपुर, चरमा, बसोट, सोनहट, रायपुर, लखनपुर मुख्य कोयला उत्पादक क्षेत्र हैं।
  7. महाराष्ट्र – यह देश का पाँचवाँ कोयला उत्पादक राज्य है। यहाँ 5% कोयले का भण्डार पाया जाता है। चन्द्रपुर, बरोटा, बल्लारपुर काम्पटी यहाँ के मुख्य कोयला उत्पादक क्षेत्र हैं।
  8. अन्य क्षेत्र – इन राज्यों के अतिरिक्त राजस्थान, तमिलनाडु, असोम, मेघालय, उत्तर प्रदेश के कुछ स्थानों पर भी कोयले के । भण्डार पाये जाते हैं।

भारत में कोयले का उपयोग (Use of Coal in India) :-

भारत में कोयला ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। यह देश की ऊर्जा की 67% खपत को पूरा करता है। इसका उपयोग इस्पात और कार्बो-रासायनिक उद्योगों में भी होता है। भारत में कोयले से ‘ताप विद्युत्’ भी पैदा की जाती है। इसके उपयोग द्वारा उत्तर प्रदेश में हरदुआगंज, अनपरा, ओबरा, पनकी, पारीछा और ऊँचाहार स्थानों पर ताप विद्युत् केन्द्र स्थापित किये गये हैं।

कोयले का संरक्षण (Conservation of Coal) :-

भारत में निम्न उपायों द्वारा कोयले का संरक्षण किया जा सकता है–

  1. कोयल की खुदाई करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि कोयले के चूरे कम हों यदि हों भी तो उनकी टिकली बनाकर उपयोग करें।
  2. कोयला खान को बाढ़ के पानी से बचाना चाहिए।
  3. कोयले की खदानों को आग से बचाना चाहिए क्योंकि इससे काफी श्रमिकों की मौत हो जाती है।
  4. खानों की खुदाई करते समय पूरा कोयला निकाल लेना चाहिए।
  5. कोयले की खान को नमी व वर्षा से बचाना चाहिए क्योंकि गीला होने पर कोयले से ज्यादा धुआँ निकलता है।
  6. कोयले को खुले स्थान पर नहीं रखना चाहिए क्योंकि इससे उसकी गुणवत्ता में कमी हो जाती है।
  7. कोयले को जिस भट्टी में जलाया जाय उनकी चिमनी ऊँची होनी चाहिए।
  8. कोयले से तापीय ऊर्जा प्राप्त करने के लिए उसको अधिक उन्नत करके उसका संरक्षण किया जा सकता है।
  9. कोयले की खदानों में गैस के इकट्ठा हो जाने से विस्फोट होता है जिससे कोयले का भण्डार नष्ट हो जाता है और श्रमिकों की मौत हो जाती है।

उत्पादन एवं व्यापार (Production and Trade) :-

सन् 1950-51 में भारत में 344 लाख टन कोयले का उत्पादन हुआ था। सन् 2003 में यह उत्पादन बढ़कर 341 मिलियन टन तक हो गया। वर्ष 2003 और 2004 के दौरान कोयले का उत्पादन 36.117 करोड़ टन अनुमानित था जिसमें 30.63 करोड़ टन कोल इंडिया लि०, 3.385 करोड़ टन सिंगरौली कोयला खानों तथा 2.093 करोड़ टन उद्योगों की खदानों से अनुमानित था। 2006-2007 में 34.83 करोड़ टन, 2007-2008 में 38.44 करोड़ टन एवं 2013-14 में 565.77 मिलियन टन कोयले का उत्पादन हुआ। भारत से बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मॉरीशस तथा म्यांमार आदि देशों को कोयला निर्यात भी किया जाता है। निर्यात के साथ भारत लोहा-इस्पात बनाने के लिए कोकिंग किस्म का कोयला आयात करता है।

खनिज तेल (Petrolium) :-

खनिज तेल अथवा पेट्रोलियम भी ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण साधन है। पृथ्वी के अन्दर से इसकी प्राप्ति अवसादी चट्टानों के रूप में होती है। भूगर्भ से यह कीचड़ के समान काले तेल के रूप में प्राप्त होता है। खनिज तेल को शुद्ध करने के बाद इससे पेट्रोल, डीजल, मिट्टी का तेल, मोम, ग्रीस आदि पदार्थ प्राप्त किये जाते हैं।

खनिज तेल के संचित भण्डार, क्षेत्रीय वितरण एवं उत्पादन की दृष्टि से भारत की स्थिति संतोषजनक नहीं है। भारत में 600 करोड़ टन खनिज तेल का संचित भंडार है लेकिन अभी केवल 62 करोड़ टन के भण्डार का पता चल पाया है। प्रायद्वीपीय पठार के अतिरिक्त समस्त क्षेत्र में अवसादी चट्टानों में खनिज तेल मिलने की सम्भावना है। समुद्र तटीय पेटियाँ, महाद्वीपों का निमग्न तट और उत्तरी भारत के मैदानी भागों में खनिज तेल के भण्डार मिलने की सम्भावना है।

भारत में खनिज तेल उत्पादक क्षेत्र :-

भारत में खनिज तेल का उत्पादन मुख्यतः तीन राज्यों में होता है-

  1. असोम – असोम भारत का सबसे पुराना खनिज तेल उत्पादक राज्य है। इसका विस्तार ब्रह्मपुत्र घाटी से आराकान तट तक लगभग 10,000 किमी लम्बी पट्टी के रूप में फैला है। यहाँ खनिज तेल के तीन क्षेत्र हैं।
    • डिगबोई तेल क्षेत्र – यहाँ पहला कुआँ खोदा गया। यहाँ के डिगबोई, बधापुंग और हंसापुंग क्षेत्रों में स्थित तेलकूपों से तेल निकाला जाता है।
    • सुरमा घाटी क्षेत्र – यहाँ के बदरपुर, मसीमपुर तथा पथरिया के तेलकुओं से तेल निकाला जाता है।
    • ब्रह्मपुत्र घाटी क्षेत्र – यह असोम का सबसे नवीन तेल क्षेत्र है जो डिगबोई के दक्षिण में ब्रह्मपुत्र घाटी में स्थित है। यहाँ नहरकटिया, हुगरीजन तथा मोरन आदि स्थानों से तेल निकाला जाता है।
  1. गुजरात – गुजरात भारत का दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण राज्य है। यहाँ तेल का उत्पादन 1958 से शुरू हुआ था। इस राज्य में 15,361 वर्ग किमी क्षेत्र पर तेल की पट्टी फैली है। इस राज्य के तीन प्रमुख तेल क्षेत्र हैं-
    • अंकलेश्वर तेल क्षेत्र – इस क्षेत्र में भड़ौच जिले के अन्तर्गत 1200 मीटर की गहराई से तेल प्राप्त किया जाता है।
    • लुनेज या खम्भात क्षेत्र – यह क्षेत्र खम्भात की खाड़ी के सिरे पर स्थित है।
    • कलोल क्षेत्र – यहाँ के नवगाँव, कोसम्बा, मेहसाना, सानन्द तथा कोथाना में स्थित तेलकूपों से तेल निकाला जाता है।
  1. महाराष्ट्र – खनिज तेल के उत्पादन में इस राज्य का तटीय भाग ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। अरब सागर में मुम्बई से 176 किमी उत्तर पश्चिम में स्थित मुम्बई हाई तेल क्षेत्र में 1976 से तेल का उत्पादन किया जा रहा है। इसका विस्तार 2,500 वर्ग किमी क्षेत्र पर है। वर्तमान समय में मुम्बई से देश का 60% तेल निकाला जा रहा है। मुम्बई हाई के दक्षिण में स्थित बसई तेल क्षेत्र तथा गुजरात के पश्चिम में समुद्र में स्थित अलियावेट द्वीप से भी खनिज तेल निकाला जा रहा है। गोदावरी व कावेरी नदियों के डेल्टाई भागों से भी तेल निकाला जा रहा है।

तेल शोधनशालाएँ :-

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पहले भारत में केवल एक तेल शोधनशाला डिगबोई में थी। परन्तु वर्तमान समय में भारत में 22 तेल शोधनशालाएँ हैं, जिसमें 17 सार्वजनिक क्षेत्र में एवं 3 निजी क्षेत्र में स्थापित है। रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड निजी क्षेत्र की कम्पनी है। प्रमुख तेल शोधनशालाएँ निम्न हैं-

  1. ट्राम्बे-I (मुम्बई के पास)
  2. ट्राम्बे-II (महाराष्ट्र)
  3. विशाखापट्टनम (आन्ध्रप्रदेश)
  4. बरौनी (बिहार)
  5. कोयली (गुजरात)
  6. हल्दिया (पश्चिमी बंगाल)
  7. डिगबोई (असोम)
  8. बोंगाईगाँव (असोम)
  9. नूनमाटी (असोम)
  10. कोचीन (केरल)
  11. चेन्नई (तमिलनाडु)
  12. मथुरा (उत्तर प्रदेश)
  13. करनाल (हरियाणा)
  14. गोवा (गोवा)।

खनिज तेल का उपयोग :-

खनिज तेल के निम्न प्रकार हैं-

  1. खनिज तेल का उपयोग वायुयान, जलयान, रेलगाड़ियों, मीटर एवं अन्य वाहनों को चलाने के लिए किया जाता है।
  2. इससे निकले पदार्थों से फिल्म, प्लास्टिक, वार्निश, पॉलिश, मोमबत्ती और वैसलीन बनायी जाती है।
  3. खनिज तेल को साफ करके पेट्रोल, मिट्टी का तेल, मोबिल आयल, मोम, ग्रीस, डीजल, गैसोलिन जैसे उपयोगी पदार्थ प्राप्त किये जाते हैं।

खनिज तेल का संरक्षण (Conservation of Petrolium) :-

भारत में खनिज तेल के संरक्षण के लिए निम्न उपाय करने चाहिए-

  1. खनिज तेल का भण्डार सीमित है इसलिए इसका उपयोग आवश्यक कार्यों में करें। मशीनों की नियमित सफाई व ग्रीसिंग करें जिससे तेल की खपत कम हो।
  2. देश में हमेशा नये तेल क्षेत्रों की खोज होती रहनी चाहिए।
  3. खनिज तेल को आग से बचाना चाहिए।
  4. तेल के स्थान पर दूसरे साधन द्वारा ऊर्जा प्राप्त करना चाहिए जिससे तेल का संरक्षण हो सके।
  5. खाना पकाने के लिए गैस का इस्तेमाल करें जिससे खनिज तेल की बचत होगी।
  6. तेल के टैंकरों एवं पाइप लाइनों को समय-समय पर चेक करना चाहिए जिससे उनमें रिसाव न हो।
  7. समुद्र एवं भू-गर्भ से तेल निकालते समय बर्बादी को रोकना चाहिए।
  8. विद्युत् व पेट्रोलियम के भण्डारण के उन्नत तरीकों को अपनाकर 15% तक ऊर्जा बचायी जा सकती है।
  9. खनिज तेल के प्रयोग की प्रौद्योगिकी में सुधार कर तेल के प्रयोग करने की ऐसी तकनीक विकसित की जाय जिससे इसकी क्षमता बढ़ सके।

उत्पादन एवं व्यापार :-

पिछले 50 सालों से भारत ने इस क्षेत्र में तेजी से प्रगति की है। भारत में इसकी माँग अधिक है इसलिए विदेशों से खनिज तेल का आयात करना पड़ता है। सन् 1950-51 में खनिज तेल का उत्पादन 2.7 लाख टन था, जबकि माँग 24 लाख टन थी। सन् 1960-61 में उत्पादन बढ़कर 5.0 लाख टन हो गया परन्तु माँग भी बढ़कर 75 लाख टन हो गयी। सन् 2000 में खनिज तेल का उत्पादन 319.5 लाख टन हो गया। वर्ष 2011 के दौरान देश में कच्चे तेल का उत्पादन 377.00 लाख टन हुआ। खनिज तेल के अधिक खपत के कारण भारत को इराक, ईरान, सउदी अरब, कुवैत, संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस से कच्चे तेल एवं पेट्रोलियम उत्पादनों का आयात करना पड़ता।

प्राकृतिक गैस (Natural Gas) :-

प्राकृतिक गैस ऊर्जा का नवीन स्त्रोत है, इसका उपयोग घरेलू है। यह कच्चे तेल के साथ मिश्रित अवस्था में मिलता है। भारत में प्राकृतिक गैस का पता तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग एवं आयल इण्डिया लिमिटेड ने किया था। 1 अप्रैल, 2000 को उपयोग करने योग्य शेष गैस भण्डार 647 अरब घन मीटर था।

भारत में प्राकृतिक गैस का वितरण क्षेत्र :-

भारत के पूर्वी क्षेत्र में असोम, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम में गुजरात, मुम्बई हाई तथा दक्षिण में कृष्णा, कावेरी व गोदावरी नदियों घाटी में गैस के विशाल भण्डार स्थित हैं। अब तक गुजरात, मुम्बई अपतट एवं असोम में काफी गैस को जलाया जाता था, लेकिन अब इस पर रोक लगायी जा रही है। घाटी क्षेत्रों से 35% (LPG) रसोई गैस प्राप्त होती है। 2,650 किमी लम्बी हजीरा – विजयपुर-जगदीशपुर पाइप लाइन द्वारा 6 खाद के कारखानों तथा 3 ताप विद्युत् गृहों को गैस भेजी जाती है। इससे प्रतिदिन 182 घन मीटर गैस भेजी जाती है।

प्राकृतिक गैस का उपयोग (Uses of Natural Gas) :-

प्राकृतिक गैस के निम्न उपयोग हैं-

  1. प्राकृतिक गैस ऊर्जा का साधन है।
  2. प्राकृतिक गैस का उपयोग पेट्रो रसायन उद्योग में कच्चे माल के रूप में किया जाता है।
  3. इसका उपयोग रासायनिक उर्वरकों के निर्माण में किया जाता है।
  4. इसका उपयोग ईंधन के साधन के रूप में भी होता है।

प्राकृतिक गैस का संरक्षण (Conservation of Natural Gas) :-

प्राकृतिक गैस का संरक्षण करना अत्यन्त कठिन कार्य है लेकिन निम्न उपायों द्वारा इसका संरक्षण किया जा सकता है-

  1. प्राकृतिक गैस को सिलेण्डरों में भरकर रसोई ईंधन के रूप में सुरक्षित रखा जा सकता है।
  2. पेट्रोरसायन व रासायनिक खादों में इसका उपयोग करके इसे संरक्षित किया जा सकता है।
  3. प्राकृतिक गैस का उपयोग करके इसे संरक्षित किया जा सकता है।

उत्पादन एवं व्यापार :-

वर्ष 1980-81 में 235.8 करोड़ घनमीटर प्राकृतिक गैस का उत्पादन हुआ था जो 2003-04 में बढ़कर 3.196 करोड घनमीटर तक पहुँच गया। 2006-2007 में 317.47 करोड़ घन मीटर, 2007-2001 में हुआ था। करोड घन मीटर एवं 2010-11 में 522.2 करोड़ घन मीटर हो गया। वर्ष 2014-15 में प्राकृतिक गैस का उत्पादन 36,62 बिलियन क्यूबिक मीटर रहा। देश में इसका अनुमानित भण्डार 54,100 करोड़ घनमीटर है।

परमाणु ऊर्जा (Atomic Energy) :-

जिन खनिज पदार्थों में रेडियोधर्मी तत्त्व पाए जाते हैं, उन्हें परमाणु खनिज कहते हैं, जैसे-यूरेनियम, थोरियम, बेरीलियम, ग्रेफाइड, एण्टीमनी, प्लूटोनियम, चेरलाइट, जिरकोनियम, इल्मेनाइट आदि। इन खनिज पदार्थों में अणुओं तथा परमाणुओं के विघटन से एक प्रकार की ऊर्जा शक्ति उत्पन्न होती है, जिसे ‘परमाणु ऊर्जा’ के नाम से जाना जाता है।

भारत में कोयला और पेट्रोलियम के सीमित भण्डार हैं। इसलिए देश में इस बात की आवश्यकता हुई कि आणविक खनिजों की खोज करके ऊर्जा की प्राप्ति के नये साधन तलाशे जायें। जिन पदार्थों में रेडियोधर्मी तत्त्व पाये जाते हैं उन्हें परमाणु खनिज (Atomic Mineral) कहते हैं। जैसे— यूरेनियम, थोरियम, बेरीलियम, जिरकान, ग्रेफाइट, एण्टीमनी, प्लूटोनियम, चेरलाइट, जिरकोनियम, इल्मेनाइट आदि। इन खनिज पदार्थों में अणुओं और परमाणुओं के विघटन से एक प्रकार की ऊर्जा निकलती है जिसे ‘परमाणु ऊर्जा’ (Atomic energy) कहते हैं। एक पौंड यूरेनियम से जितनी ऊर्जा मिलती है उतनी 12 किग्रा कोयले से प्राप्त होती है। देश में ऊर्जा की बढ़ती हुई खपत के कारण परमाणु शक्ति बोर्ड ने विभिन्न स्थानों पर परमाणु ऊर्जा केन्द्रों की स्थापना की है।

परमाणु ऊर्जा के केन्द्र (Centres of Atomic Energy) :-

भारत में परमाणु ऊर्जा के छह केन्द्र हैं जो निम्न हैं-

  1. प्रथम केन्द्र – सन् 1969 में मुम्बई के निकट तारापुर नामक स्थान पर बनाया गया जो एशिया का सबसे बड़ा केन्द्र है।
  2. दूसरा केन्द्र – राजस्थान में कोटा के समीप रावतभाटा नामक स्थान पर बनाया गया है। यह चम्बल नदी के राणा प्रताप सागर बाँध पर स्थित हैं। इसे कनाडा के सहयोग से चलाया जा रहा है।
  3. तीसरा केन्द्र – यह तमिलनाडु राज्य में चेन्नई के निकट कलपक्कम में बनाया गया है। यह परमाणु शक्ति गृह पूर्णतः स्वदेशी है।
  4. चौथा केन्द्र – यह उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर में गंगा नदी के किनारे नरौरा नामक स्थान पर है। इसका मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र की विद्युत् आवश्यकता को पूरा करना है।
  5. पाँचवाँ केन्द्र – यह केन्द्र गुजरात राज्य में ताप्ती नदी पर काकरापारा नामक स्थान पर बनाया गया है।
  6. छठवाँ केन्द्र – यह केन्द्र कर्नाटक राज्य के केगा नामक स्थान पर स्थापित किया गया है।

वर्तमान समय में देश में 20 परमाणु ऊर्जा रिएक्टर काम कर रहे हैं जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 2011 में 4780 मेगावाट है। भारत ने रूसी परिसंघ के साथ कुण्डनकुलम (तमिलनाडु) में 1000 मेगावाट क्षमता के दो दावित भारी जल रिएक्टरों सहित एक परमाणु शक्ति केन्द्र स्थापित करने के लिए समझौता किया है। इनका निर्माण 31 मार्च, 2002 से चल रहा है। इसकी अधिकतमपूर्ण क्षमता 9200 मेगावाट निर्धारित की गयी है। रत्नागिरि (महाराष्ट्र) में फ्रांस के सहयोग से जैतापुर में 9900 मेगावाट क्षमता का परमाणु बिजली घर फ्रांस की अरेवा कम्पनी के सहयोग से बनाने का समझौता 2010 में किया गया था। इस पर कार्य प्रगति पर है।

परमाणु ऊर्जा का महत्त्व (Importance of Atomic Energy) :-

परमाणु ऊर्जा की निम्न विशेषताओं के कारण इसका महत्त्व बढ़ गया है-

  1. परमाणु ऊर्जा में अपार क्षमता एवं शक्ति होती है।
  2. परमाणु ऊर्जा के केन्द्र उन स्थानों पर बनाये जाते हैं जहाँ परमाणु ऊर्जा का ईंधन उपलब्ध नहीं है।
  3. परमाणु ऊर्जा का सर्वव्यापी उपयोग सम्भव है।
  4. ऊर्जा के अन्य साधनों की कमी को परमाणु ऊर्जा से पूरा किया जा सकता है।
  5. चिकित्सा और कृषि के क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण उपयोग में भारत का अग्रणी स्थान है।
  6. किसी भी देश के विकसित व शक्तिशाली होने में इसका विशेष महत्त्व है |
  7. परमाणु ऊर्जा के विस्फोट का प्रभाव तत्काल तथा भविष्य दोनों के लिए हानिकारक है।

परमाणु ऊर्जा का संरक्षण (Conservation of Atomic Energy) :-

परमाणु ऊर्जा के महत्त्व को देखते हुए इसका संरक्षण अत्यन्त जरूरी है। परमाणु ऊर्जा के लिए सहायक परमाणु खनिज जैसे— यूरेनियम, थोरियम व मोनाजाइट के भण्डार को सुरक्षित रखना बहुत जरूरी है। इसका प्रयोग करके परमाणु ऊर्जा का निर्माण करना चाहिए जिससे भविष्य में उपयोग किया जा सके। समस्त परमाणु सम्पन्न राष्ट्र भारत पर दबाव डाल रहे हैं कि वह न तो परमाणु अस्त्रों का निर्माण करे और न ही इसका उपयोग करे लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु ऊर्जा का विकास करना आवश्यक है।

वैकल्पिक साधन (Optional Means)

पवन ऊर्जा (Wind Energy) :-

पवन ऊर्जा का प्रयोग पानी खींचने के लिए किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि हेतु सिंचाई की परम आवश्यकता पड़ती है। पवन ऊर्जा इस कार्य में सहायक है। गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और ओडिशा इसके लिये उपयुक्त राज्य हैं। अब पवन ऊर्जा से उत्पादित बिजली को ग्रिड प्रणाली में सम्मिलित कर लिया गया है। भारत-2012 के अनुसार 2009 के अन्त तक भारत में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता 12000 मेगावाट थी। पवन ऊर्जा के क्षेत्र में भारत का पाँचवाँ तथा एशिया में दूसरा स्थान है। भारत में तमिलनाडु प्रथम स्थान पर, महाराष्ट्र द्वितीय तथा कर्नाटक तीसरे स्थान पर है। वैश्विक पवन ऊर्जा के उत्पादन में भारत का योगदान 8.0 प्रतिशत से अधिक है।

सौर ऊर्जा (Solar Energy) :-

सौर ऊर्जा, ऊर्जा का अक्षय साधन है। इससे अधिक मात्रा में ऊर्जा मिलती है। यह विशाल संभावनाओं वाला साधन है। इस क्षेत्र में सौर चूल्हों का विकास एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे बिना किसी खर्च के भोजन बनाया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में सौर ऊर्जा से छोटे बिजलीघरों की भी योजना चल रही है। आजकल खाना पकाने, पानी गर्म करने, फसलों को सुखाने तथा सौर ऊर्जा की लालटेन का प्रयोग भी चल रहा है। यह ऐसा साधन है जो कभी भी समाप्त होने वाला नहीं है। देश में फरवरी, 2014 तक कुल मिलाकर 1175 मेगावाट ग्रीड क्षमता से अधिक सौर बिजली, उत्पादन क्षमता प्राप्त की गयी है। मध्य प्रदेश में 130. मेगावाट क्षमता का सौर ऊर्जा संयन्त्र नीमच जिले में जावर तहसील के डीकेन, भगवानपुरा व पंडालिया गाँवों में स्थापित किया गया है। 370 हेक्टेयर भूमि पर स्थापित ₹ 1100 करोड़ के निवेश वाली यह परियोजना देश की सबसे बड़ी सौर ऊर्जा परियोजना है।